

बलौदाबाजार का एक शांत सा दोपहर का समय अचानक खिलखिलाहट, गीतों और स्नेहिल मुस्कानों से गूंज उठा, जब Extraordinary Class World School के नन्हे-मुन्ने बच्चे स्थानीय वृद्धाश्रम पहुँचे। यह केवल एक औपचारिक भ्रमण नहीं था, बल्कि पीढ़ियों के बीच प्रेम, सम्मान और संस्कारों का एक भावुक सेतु बन गया।
भावुक कर देने वाला मिलन
जैसे ही बच्चों का दल वृद्धाश्रम के आँगन में पहुँचा, वहाँ का शांत वातावरण चहचहाहट से महक उठा। छोटे-छोटे हाथों ने झुककर बुजुर्गों के चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया। यह दृश्य इतना आत्मीय था कि कई बुजुर्गों की आँखें नम हो गईं।
किसी ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरा, तो किसी ने उन्हें अपने पास बैठाकर दुलार किया। कुछ बुजुर्ग तो बच्चों को देखकर अपने पोते-पोतियों की याद में भावुक हो उठे और उन्हें गले लगाकर लंबे समय तक स्नेह बरसाते रहे।
उपहारों और प्यार का वितरण
बच्चे अपने साथ केवल उपहार ही नहीं, बल्कि दिलों में भरा अपनापन भी लाए थे। स्कूल के सहयोग से उन्होंने बुजुर्गों के लिए दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भेंट कीं।
साथ ही, कुछ बच्चों ने मधुर भजन प्रस्तुत किए, तो कुछ ने कविताओं और छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से वातावरण को आनंदमय बना दिया। तालियों की गड़गड़ाहट और मुस्कुराते चेहरे इस बात के साक्षी थे कि यह पल सभी के लिए कितना खास था।
संस्कारों की सीख, समाज से जुड़ाव
विद्यालय की प्राचार्या डॉ. एकता शुक्ला ने बताया कि इस भ्रमण का उद्देश्य बच्चों में नैतिक मूल्यों, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है। उन्होंने कहा,
“आज के डिजिटल युग में बच्चे बुजुर्गों के अनुभव और उनके महत्व को भूलते जा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रम उन्हें रिश्तों की गहराई और आशीर्वाद की शक्ति का एहसास कराते हैं।”
वास्तव में, यह पहल केवल एक सामाजिक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन के पाठ की एक जीवंत कक्षा बन गई—जहाँ बच्चों ने किताबों से परे संवेदनाओं का ज्ञान अर्जित किया।
बच्चों की आँखों से देखी दुनिया
एक छात्र ने उत्साह से कहा,
“हमें यहाँ आकर बहुत अच्छा लगा। दादा-दादी की कहानियों और उनके आशीर्वाद ने हमारा दिन बना दिया। हम फिर से यहाँ आना चाहेंगे।”
इन मासूम शब्दों में छिपी सच्चाई ने यह साबित कर दिया कि संस्कारों की नींव बचपन से ही रखी जाती है।
सराहनीय सहयोग
वृद्धाश्रम के संचालकों ने विद्यालय की इस पहल की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम बुजुर्गों के अकेलेपन को कम करते हैं और उन्हें समाज से जुड़े होने का सुखद एहसास कराते हैं।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यालय के शिक्षक यशवंत वैष्णव, आकांक्षा मैम, काजल मैम, सुशील सर और सपना मैम का सहयोग विशेष रूप से सराहनीय रहा।
इस मानवीय पहल ने यह संदेश दिया कि यदि बच्चों को सही दिशा और संस्कार मिलें, तो वे समाज में प्रेम और सम्मान की ज्योति जला सकते हैं। नन्हीं खुशियों की यह सुगंध केवल वृद्धाश्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे शहर को संवेदनाओं से सराबोर कर गई।









